Wednesday, September 21, 2011

रहे न कोई भूखा – नंगा


– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

पराधीन रहकर सरकस का
शेर नित्य खाता है कोड़े
पराधीन रहकर बेचारे
बोझा ढोते हाथी-घोड़े.

माता – पिता छुड़ा, पिंजरे में
रखा गया नन्हा –सा तोता
वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को
देख सदा मन ही मन रोता.

चाहे पशु हो, चाहे पंछी
परवशता कब , किसको भायी
कहने का मतलब यह कि
परवशताहोती दुख:दायी.

ऐसी दुख:दायी परवशता
मानव को कैसे भायेगी ?
औरों की दासता किसी को
राहत कैसे पहुँचायेगी ?

जो गुलामहैं, उन लोगों से
उनके दुख: की बातें पूछो
हैं जो आजाद मुल्क के
उनके सुख की बातें पूछो.

कहा सयानों ने सच ही है
आजादी से जीना अच्छा
किंतु गुलामी में जिंदा,
रहने से मर जाना है अच्छा .

रह करके गोरों की परवशता में
हम क्या-क्या न खो चुके
पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को
हम आजाद हो चुके.

यह सब अपने अमर शहीदों के
भारी जप-तप का फल है.
मिलकर रहें, देश पनपावें
तब तो फिर भविष्य उज्जवल है.

आजादी पर आँच न आवे
लहर-लहर लहराय तिरंगा
हम संकल्प आज लेवें कि
रहे न कोई भूखा – नंगा.

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Tuesday, September 20, 2011

श्रम का सूरज (छंद)


– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

श्रम का सूरज उगा, बीती विकराल रात,
भागा घोर तम, भोर हो गया सुहाना है.
आलस को त्याग–अब जाग रे श्रमिक, तुझे
नये सिरे से नया भारत सिरजाना है.
तेरे बल- पौरुष की होनी है परीक्षा अब
विकट कमाल तुझे करके दिखाना है.
आया है सृजन-काल, जाग रे सृजनहार,
जाग कर्मवीर, जागा सकल जमाना है.

फावड़ा-कुदाल, घन-सब्बल सम्हाल, उठ
निरमाण-कारी, तुझे जंग जीत आना है.
फोड़ दे पहाड़, कर पाषाणों को चूर-चूर
खींच ले खनिज, माँग रहा कारखाना है.
रोक सरिता का जल, प्यासी धरती को पिला
इंद्र का बगीचा तुझे यहीं पै लगाना है.
ऊसर मरू-भूमियों का सीना चीर ! तुझे
अन्न उपजाना है भूखों को खिलाना है.

जाग रे भगीरथ- किसान, धरती के लाल,
आज तुझे ऋण मातृ भूमि का चुकाना है.
आराम-हरामवाले मंत्र को न भूल,तुझे
आजादी की गंगा’ , घर-घर पहुँचाना है.
सहकारिता से काम करने का वक्त आया
कदम मिला के अब चलना – चलाना है.
मिल जुल कर उत्पादन बढ़ाना  है
एक-एक दाना बाँट-बाँट कर खाना है.

Saturday, September 17, 2011

राह उन्हीं की चलते जावें


– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

जो अपने सारे सुख तज कर
जन-हित करने में जुट जावें
दूर विषमतायें कर - कर के
जो  समाज में समता लावें
जन-जागरण ध्येय रख अपना
घर-घर जाकर अलख जगावें
उनके अनुगामी बन कर हम
राह उन्हीं की चलते जावें.

लहू-पसीना औंटा करके
खेतों में अनाज उपजावें
जो खदान-कारखानों के
कार्यों से न कभी घबरावें
“है आराम-हराम” समझकर
उत्पादन  को  खूब  बढ़ावें
वैसे  ही  श्रम-वीर बने हम
राह उन्हीं की चलते जावें.

कोटि-कोटि जन भारत के हम
उत्तम सैनिक - शिक्षा पावें
अपने  वीर  सैनिकों  जैसे
हम भी रण-कौशल दिखलावें
सीमा  पर   इतराने  वाले
दुश्मन को हम मजा चखावें
प्राण गँवाया हँसकर जिनने
राह उन्हीं की चलते जावें.

Wednesday, September 14, 2011

“जय हिंदी – जय देवनागरी”

– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

सरल, सुबोध, सरस, अति सुंदर, लगती प्यारी-प्यारी है
देवनागरी लिपि जिसकी, सारी लिपियों से न्यारी है.
ऋषि-प्रणीत संस्कृत भाषा, जिस भाषा की महतारी है
वह हिंदी भाषा भारत के लिये परम-हितकारी है.

सहती आई जो सदियों से, संकट भारी-भारी है
जीवित रही किंतु अब तक ,उस भाषा की बलिहारी है.
तुलसी, सूर, रहीम आदि ने की जिसकी रखवाली है
वह हिंदी भाषा भारत के लिये परम –हितकारी है.

कर न सकी जिसकी समता अरबी, उर्दू, हिंदुस्तानी
बनी सर्व-सम्मति से जो सारी भाषाओं की रानी
मंद पड़ गई जिसके आगे, अंगरेजी बेचारी है
वह हिंदी भाषा भारत के लिये परम –हितकारी है.

“जय हिंदी – जय देवनागरी”-कहती जनता सारी है
आज हिंद का बच्चा –बच्चा ,जिसका बना पुजारी है
भरी अनूठे रत्नों से, जिसकी साहित्य – पिटारी है
वह हिंदी भाषा भारत के लिये परम –हितकारी है.

Sunday, September 4, 2011

गुरु है सकल गुणों की खान –


-जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

गुरु, पितु, मातु, सुजन,भगवान, 
ये पाँचों हैं पूज्य महान
गुरु  का  है  सर्वोच्च  स्थान , 
गुरु है सकल गुणों की खान.


कर अज्ञान तिमिर का नाश, 
दिखलाता यह ज्ञान-प्रकाश
रखता  गुरु  को  सदा  प्रसन्न , 
बनता  वही  देश सम्पन्न.


कबिरा, तुलसी, संत-गुसाईं, 
सबने गुरु की महिमा गाई
बड़ा  चतुर  है यह कारीगर , 
गढ़ता गाँधी और जवाहर.


आया पावन पाँच-सितम्बर ,
श्रद्धापूर्वक हम सब मिलकर
गुरु की महिमा गावें आज , 
“ शिक्षक-दिवस ” मनावें आज.


एकलव्य – आरुणि की नाईं , 
गुरु के शिष्य बने हम भाई
देता  है   गुरु विद्या – दान , 
करें  सदा  इसका  सम्मान.


अन्न –वस्त्र –धन दें भरपूर , 
गुरु  के  कष्ट  करें  हम  दूर
मिल जुलकर हम शिष्य–सुजान ,
करें राष्ट्र का नवनिर्माण.

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कविता और कवि


– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”
 
कवि पैदा होकर आता है
होती कवियों की खान नहीं
कविता करना आसान नहीं.

कविता कर सके सूर तब , जब अपनी दोनों आँखें फोड़ी
कविता कर सके संत तुलसी , जब अपनी प्रिय रत्ना छोड़ी
कविता कर सके कबीर कि जब झीनी-झीनी चादर ओढ़ी
दे गये जगत को अमर काव्य , जब त्याग-तपस्या की थोड़ी.

युग-युग तक कभी भूल सकता
मानव इनका एहसान नहीं
कविता करना आसान नहीं.

वह तरकस क्या ? जिसमें कि एक भी, जन-मन भेदी बाण नहीं
वह कोठी भूसा – भरी व्यर्थ , जिसमें दो दाना धान नहीं
उसको सागर कहना फिजूल , जिसमें लहरें – तूफान नहीं
वह कविता क्या जिसमें, युग-परिवर्तन-बल उच्च उड़ान नहीं.

वह कवि क्या जिसे कि
सत्यम् शिवम् सुंदरम् का हो भान नहीं
कविता करना आसान नहीं.

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Thursday, September 1, 2011

गणेश वंदना .....

-जनकवि कोदूराम "दलित"

जय -जय गणेश महाराजा  मुसवा में चढ़ के आजा
 
जय गणपति फरसाधारी  कर दूर हमर बेकारी
 
मैं तोला चढ़ाहूँ पानी  तैं मोला बना दे ज्ञानी
 
मैं तोला खवाहूँ खीरा  कर दूर मोर दुःख-पीरा
 
मैं तोला खवाहूँ बासी  कर दूर मोर जर-खाँसी
 
मैं तोला खवाहूँ बरी  कर हमर भुखमरी
 
मैं तोला चढ़ाहूँ माला  सुख शांति मिले दुनिया-ला
 
मैं तोला चढ़ाहूँ नरियर  मोर खेती ला कर दे हरियर
 
मैं तोला खवा के केरा पां परथौं जाये के बेरा

                                            
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