Thursday, September 20, 2012

शत शत प्रणाम करुणा सागर.......


जनकवि स्व. कोदूराम “दलित”

 
(चित्र गूगल से साभार) 

हे ओम् रूप , गज वदन देव
हे  गणनायक ,  हे  लम्बोदर  |
हे सिद्धि सदन ,कल्याण धाम
शत-शत प्रणाम करुणा सागर  ||

हे एकदंत   ,     हे दयावंत
विज्ञान पुंज ,  अनुपम  उदार  |
कर  दूर अविद्या  , अनाचार
भर दे जन-जन में सद् विचार ||

सुख शांति सम्पदा  कर प्रदान
त्रय ताप पाप  दुख दारिद हर  |
हे ओम् रूप ,  गज वदन देव
हे  गणनायक ,  हे  लम्बोदर  ||

भारत - स्वतंत्रता  रहे  अमर
गण-तंत्र  सफल  होवे  प्रभुवर  |
दे दिव्य ज्ञान, दे शक्ति प्रखर
हो  जायँ  विज्ञ सब नारी नर  ||

सुख - सुषमा लहरावे घर घर
यश  छा जावे  अवनी अम्बर  |
हे ओम् रूप ,  गजवदन देव
हे  गण नायक ,  हे लम्बोदर  ||

हे सिद्धि सदन ,कल्याण धाम
शत-शत प्रणाम करुणा सागर ||

जनकवि स्व. कोदूराम “दलित”
हिंदी काव्य संचय

Friday, September 14, 2012

हिंदी


देवनागरी लिपि हे जेकर
गजब सरल अउ सुंदर
हवय ज्ञान बिज्ञान सबो
जेकर साहित के अंदर
अइताचार सहिस अड़बड़ पर
रहिगे ये हर ज़िंदी
बनिस राष्ट्रभाषा हमार
हम सबके प्यारी हिंदी |

येकर मान करय सब जनता
हिंदी अउ अ-हिंदी
ये जान्हवी बनिस अउ बनगें
सब भाषा कालिंदी
बोलयँ ये भाषा-ला मदरासी
बंगाली, सिंधी
बनिस राष्ट्रभाषा हमार
हम सबके प्यारी हिंदी |

अँगरेजी के मोह छोड़ के
ये ही ला अपनाबो
अब येकर बिकास खातिर
सब्बो झिन मन भिड़ जाबो
आय इही हर भारत माता के
माथा के बिंदी
बनिस राष्ट्रभाषा हमार
हम सबके प्यारी हिंदी |

जनकवि -स्व.कोदूराम “दलित”

Tuesday, August 14, 2012

“अमर हो स्वाधीनता”

जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

हिंद का स्वर्णिम परब, ‘पंद्रह अगस्त’पुनीत आया
नव-उमंगें  , नव-तरंगें  –  सुभग नव-संदेश लाया ||

आज ही नूतन हुआ था, बदल कर इतिहास अपना
आज ही के दिन हमारा, था हुआ साकार सपना ||

आज ही टूटे थे बंधन, पर-वशा माँ –भारती के
आज ही हर घर जले थे, जगमगाते दीप घी के ||

आज ही के दिन हटे थे, विवश होकर के फिरंगी
आज ही नव-ललित ,लहराई पताका थी तिरंगी ||

आज ही के दिन खिली थी, उन शहीदों की सु-टोली
खिल उठा था बाग जलियाँ, खिल उठी थी बारडोली ||

आज जनता  हिंद की ,  मन में नहीं  फूली समाती
आज तिलक, सुभाष, गाँधी के सुमंगल गान गाती ||

आज अपने देश का ,  होगा  यही  बस एक नारा:-
“अमर हो स्वाधीनता” – फूले-फले भारत हमारा ||

शीघ्र कर दें दूर मिलकर, हिंद की सारी व्यथाएँ
प्रेरणा  देती  रहें  ,  हमको  शहीदों  की  कथाएँ ||

-जनकवि स्व.कोदूराम “दलित”

Tuesday, April 24, 2012

गोरे गालों पर काला तिल खूब दमकता


हिंदी काव्य संचय- जनकवि कोदूराम “दलित”
काला
काला  अच्छा  है   , काले  में  है  अच्छाई
दुनियाँवालों ! काले की मत करो बुराई.

सुनो  ध्यान  से  काले की  गुणभरी कहानी
बड़ी    चटपटी , बड़ी  अटपटी , बड़ी  सुहानी
प्रथम पूज्य है जो गणेश जग में जन-जन का
वह   है   काला   मैल   ,   मातु   के   तन   का
गोरस   काली   गैया   का   अच्छा   होता है
पूजन   काली   मैया     का   अच्छा  होता है
चार   किसम  के  बादल   आसमान में छाते
लेकिन   काले  बादल  ही  जल बरसा जाते
काली  कोयल  की  मधुर  वाणी  मन हरती
अधिक   अन्न   पैदा  करती है काली धरती
काले   उड़दों   से   ही  तो  हम   बड़े   बनाते
स्वर्ग - लोक से जिन्हें पितरगण खाने आते
काली   लैला   की   महिमा  मजनू  से  पूछो
काली   रातों  की  गरिमा   जुगनू   से  पूछो
सकल   करम   केवल काली रातों में होता
‘राम - राम’  रटता   काले  पिंजरे  में  तोता
बनता   हीरे   जैसा  रतन, कोयला   काला
काला   लोहा    है मनुष्य  का  मित्र निराला
काली स्लेट ,पेनसिल  काली, तख्ता काला
पाता  है   इंसान   इसी   से   ज्ञान  -  उजाला
पाल रही परिवार  अनगीनित  काली स्याही
कम  है ,  इसकी जितनी भी  की जाय बड़ाई
कर  काला-बाजार  कमा लो  कस कर पैसा
बैलों    से     बेहतर   होता   है   काला   भैंसा
काला   कोट   कचहरी  में   शुभ माना जाता
‘कानून-बाज’ इसी   पर  से  पहचाना जाता
काले    की खूबियाँ   विशेष  जानना  चाहो
तो  ‘चाणक्य-चरित्र’  एक  बार  पढ़  जाओ
काले   कंचन   बाल  और  आँखें  कजरारी
पाती   है   इनको ,   किस्मत वाली ही नारी
बुढ़िया-बुढ़ऊ भी तो नित्य खिजाब लगाते
काले  बाल बताओ   किसको   नहीं सुहाते
गोरे  गालों  पर काला  तिल खूब दमकता
काले  धब्बे  वाला  चम-चम  चाँद चमकता
काला  ही   था  रचने  वाला  पावन   गीता
बिन  खटपट  के  काले  ने गोरे  को जीता
करो  प्रणाम  सदा  काली कमली वाले को
बुरा न कहना  कभी भूल कर भी काले को.

-जनकवि कोदूराम “दलित”