Friday, July 22, 2011

खादी के टोपी

-जनकवि स्व.कोदूराम "दलित"

पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे
खादी के उज्जर टोपी ये
गाँधी जी के ताज हे.

आजादी के लड़िन लड़ाई
पहिरिन ये ला वीर मन
गोरा मन के टोप झुकाइन
बलिदानी रणधीर मन.

भइस देश आजाद ,बनिस
बंचक खातिर गाज ये
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे.......

सब्बो टोपी ले उज्जर
सुग्घर सिर के सिंगार ये
ये ला अपनाओ सब झिन , देथे
सुख शांति अपार ये.

आधा गज कपड़ा खादी के
हमर बचाइस लाज ये  
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे.......


बन जाथे कनटोप इही हर
बन जाथे सुग्घर थैली
नानुक साबुन मा धो डारो
जब ये हो जावय मैली.

येकर महिमा बता दिहिस
हम ला गाँधी महराज हे
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे.......

येकर उज्जर पन हमार मन के
मन उज्जर कर देथय
येकर निरमलता हमार मन –मा
निरमलता भर देथय.

येकर गुन ला गाही तो
तर जाही तुम्हर समाज ये
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे.......

(आजादी प्राप्ति के प्रारम्भिक समय में रचित)






Saturday, June 25, 2011

सुग्घर गाँव के महिमा

-जनकवि स्व.कोदूराम "दलित"

बड़ सुग्घर बनगे हमर गाँव , अब लागे लगिस स्वर्ग साहीं
येकर महिमा ला का बतावँ ,  बड़ सुग्घर बनगे हमर गाँव.

करके जुरमिल के काम धाम ,सब झन मन बनगे सुखी इहाँ
कटगे जम्मो झन के कलेश , अब कोन्हों नइये दुखी इहाँ.
सब झन के सुधरिस चाल चलन अउ सुधरिस सब झन के सुभाव.................

अब्बड़ अन उपजारे लागिन ,कर सहकारी खेती बारी
अब होवय अन के बँटवारा ,ये मा हे लाभ भइस भारी.
अब सब्बो झन मन बनगे मंडल अउ सब्बो झन मन बनिन साव..................

दुकान लगाइस सहकारी ,बेंचयँ उहँचे सब अपन माल
अउ उहँचे जम्मो जिनिस लेयँ ,ठग-जग के अब नइ गलय दाल.
अब होथय वाजिब नाप जोख अउ होथय वाजिब भाव ताव ...........................

श्रमदान करिन कोड़िन तरिया अउ कोड़िन सुंदर कुँवा एक
सिरजाइन स्कूल – अस्पताल , सहरावयँ सब झन देख-देख.
आमा , अमली ,बर, पीपर के , रुखरई लगाइन ठाँव – ठाँव..............................

सब झन मन चरखा चलायँ अउ कपड़ा पहिनयँ खादी के
सब करयँ ग्राम-उद्योग खूब , रसदा मँ रेंगय गाँधी के.
इन अपन गाँव पनपाये बर , सुस्ताये के नइ लेयँ नाव...................................

सब्बो झन मन पढ़ लिख डारिन ,सब्बो बनगें चतुरा-सियान
अब अँगठा नहीं दँतायँ कहूँ ,आइस अतेक सब मा गियान.
मुख देखँय नहीं कछेरी के , पंचाइत मा टोरयँ नियाव......................................

नइ माने अब जादू-टोना , नइ माने मढ़ी – मसान – भूत
नइ छीयय कभू नशा-पानी , नइ मानयँ ककरो छुआछूत.
तज दिहिन अंध विश्वास सबो ,तज देइन दुविधा,भेद-भाव...............................

निच्चट चिक्कन-चातर राखयँ ,सब घर-दुवार अउ गली खोर
सबके घर बनगें हवादार , सबके घर मा आथय अँजोर
नइ हमर गाँव मा अब कोन्हों ,बीमारी के जम सकय पाँव....................................

घर-घर पालिन हें गाय-भइँस ,झड़कयँ कसके सब दही-दूध
फटकार ददरिया करयँ मौज अउ करयँ गजब के नाच-कूद.
सब्बो झन हें भोला शंकर ,नइ जानयँ चिटको पेंच – दाँव....................................

बस इही किसम भारत भर के, सुग्घर बन जावयँ गाँव-गाँव
अउ सबो योजना मन हमार , पूरा हो जावयँ ठाँव – ठाँव.
जन सुखी होयँ, मत रहयँ इहाँ, ये हाँव – हाँव अउ खाँव–खाँव................................









Saturday, June 4, 2011

सत्याग्रह

-जनकवि स्व.कोदूराम "दलित"
(आजादी के पूर्व की कविता)

अब हम सत्याग्रह करबो
कसो कसौटी –मा अउ देखो
हम्मन खरा उतरबो
अब हम सत्याग्रह करबो.

जा–जा के कलार भट्टी–मा
हम मन धरना धरबो
बेंच झन शराब –कहिबो अउ
पाँव उँकर हम परबो.
अब हम सत्याग्रह करबो..........

जंगल अउर नून के कानून
घलो तोड़ के धरबो
चाहे लाठी-डण्डा बरसे
मरबो तब्भे टरबो.
अब हम सत्याग्रह करबो..........  

जाबो जेल देश-खातिर अब-
हम्मन जीबो-मरबो
बात मानबो बापू के तब्भे
हम सब झन तरबो.
अब हम सत्याग्रह करबो..........




Monday, May 30, 2011

गरीब गोहार

-जनकवि स्व.कोदूराम "दलित"

परमेश्वर कइसन दिन आइस ,का कलजुग सिरतोन खराइस
पापिन – चण्डालिन  महँगाई , हम गरीब – गुरबा ला खाइस

कइसे  करके पाली –पोसी डउकी – लइका , कुटुम – कबीला
कब तक  हम बड़हर मन के ,  देखत रहीं चरित्तर –लीला

अड़बड़  मुसकिल  होगे  हमला , पाये खातिर रोजी - रोटी
निठुर  मनन के करना परथै ,गजब किलौली ,पाँव –पलौटी

बड़े  बिहिनिया ले  संझा तक  , माई – पीला  जाँगर पेरीं
पापी  पेट  भरे  खातिर  हम  , गारी  खाथीं घेरी - बेरी

पसिया - पेज ,कभू तिउँरा के ,ठोम्हा भर घुघरी हम खाईं
होगे  हमर  पुनस्तर  ढीला ,  काकर मेर जाके  गोहराईं

लइका  मन  हमार  लुलवाथें , पाये  बर  कोंढ़ा के रोटी
खेत - खार में जाके खाथैं , उरिद - मुंगेसा अऊ चिरपोटी

लाँघन - भूखन मरथीं हम्मन , ओमन माल-मलीदा खाथैं
मरकी  अउर  कुढ़ेरा  साहीं , उनकर  पेट बड़े  हो जाथैं

हमर  सिरागे  रुँजी-पूँजी , ऊँकर  मन  के  भरगै थैला
हम्मन अनपढ़ ,लेड़गा - कोंदा,बने हवन घानी कस बैला

कब सुराज के सुख ला पाबो ,कब मिलिही भुइयाँ घर कुरिया
कब हमार मन के दिन फिरही ,कब तक रहिबो दुरिहा-दुरिहा

निच्चट कुकुर - बिलाई साहीं , कब तक ले ठुकरायें जाबो
ठगरा मन  सब  ठगतेच जाथैं,कब तक इनला बड़े बनाबो

जर जावै अइसन जिनगानी ,जम्मो झिन ला जउन अखरगे
का ? हमार बर देउँता-धामी , घलो रूठिन कि पट ले मरगें

कब तक हम भरमाये जाबो,कब तक कहिबो किस्मत खोटी
बीता  भर चिरहा -फरिहा के , कब तक रही हमार लिंगोटी





Tuesday, May 24, 2011

छत्तीसगढी मधुर व्यंग्य - कनवा समधी

-जनकवि स्व.कोदूराम”दलित”

मैं  अउ  मोर  माहुद वाला  कनवा समधी
किंजरे बर निकले रहेन आज हम बड़े फजर
काबर  कि  समधी  हर  हमार  एक्कोदारी
देखे  नइ रहिस कभू  बपुरा हर हमर सहर.

पहिली  जा के  दुनों  झन  बुद्धू होटल मा
झड़्केन चहा , भजिया-वजिया सिगरेट पान
तब  फेर उहाँ ले असके किंजरे  हन दुन्नों
उत्ताधुर्रा   सब्बो  पारा   , सब्बो  दुकान.

लख  हमर सहर के  सोभा साफ-  सफाई ला
अकचका  गइस  समधी  हमार   एक्के दारी
अउ बोलिस कि “गउकी समधी मैं बाप जनम
नई  देखे  हौं  गा  गाँव कभू  अतका  भारी.

ये  नल-बिजली, होटल - हटरी सुग्घर मकान
टेसन,  बंगला,  कचहरी,  सिनेमा  नल-टाँकी
मठ – मंदिर,  भीड़- भड़क्का  मोटर-वोटर के
सब  देख – देख  के चकरागे  दुन्नों  आँखी.

ये  लाल बम्ब  अंधेर  अबीर-गुलाल  असन
कइसन  के  धुर्रा  उड़त  हवय  चारों कोती
खाली  आधा  घंटा  के  किंजरे –मा  समधी
सुंदर  बिन  पइसा के  रंग गे  कुरता धोती.

भन-भन भन-भन भिनक-भिनक के माँछी मन
काकर गुन ला निच्चट  जुर मिल के गावत हें
अउ  खोर - खोर, रसदा - रसदा मा  टाँका के
पावन  जल  अड़बड़  काबर  आज बोहावत हे.




रसदा  के  दुनों  कोती  सूरा  मन अघात
गोबर  साहीं  कइसन  के   पाटे  डारत हे
जम्मो  नाली के  महर-महर  मँहकाई  मा
कनवज के अत्तर हर घलाय झक मारत हे.

अउ  नवा  बगीचा  के  घलाय का कहना हे
नंदन  बन  हर  असनेच  दिखत होही सुंदर
बुढ्वा आमा मा  बइठ – बइठ के कौवा  मन
कोयली जस बड़ निक राग सुनावत हे मनहर.

उज्जर-उज्जर  पाँखी  वाला  अमली रुख मा
ये किरिर – किरिर कोकड़ा कतेक नरियावत हें
का चीज ? पटा पट गिरा गिरा के भुइयाँ ला
चितकबरी  करके  अड़बड़  सहज  उड़ावत हें.

जोड़ी-जोड़ी  चेलिक मोटियारी  घुमत  हवयँ
कस समधी ! आज सहर मा कुछु होवइया हे
मोटर मा  पानी  भर  के सड़क भिगोंवत हें
का ! कोन्हों  बड़का  नेता  आज अवइया हे.

सुनके  कनवा  समधी  के गोठ हाँसी आइस
अउ जानेंव – कि  समधी  हे  पूरा  अग्यानी
तब  ओला  समझा  के  ये बात बताएँव मैं
आये  हे  आज  इहाँ  समधी !  बसंत रानी.

हम किंजर-किंजर के थके हवन जी दुन्नों झन
अब  घर  जाईं ,  सुस्ताई  अउ  खाईं  बासी
समधी   के  भकलापन   के  सुरता   आथे
तो  आथे  मोला  ओतकेच  बेर  गजब हाँसी.