Saturday, February 4, 2012

तब के नेता – अब के नेता


– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

तब के नेता जन-हितकारी I अब के नेता  पदवी धारी  II
तब के नेता  किये कमाल  I अब के नित पहने जयमाल II

तब के नेता पटका वाले    I अब के नेता लटका वाले    II
तब के नेता गाँधी वादी    I अब के नेता निरे विवादी   II

तब के नेता काटे जेल       I अब के आधे चौथी फेल     II
तब के नेता गिट्टी फोड़ें      I अब के नेता कुर्सी तोड़ें     II

तब के नेता डण्डे खायें      I अब के नेता अण्डे खायें     II
तब के नेता लिये सुराज    I अब के पूरा भोगें राज      II

तब के नेता बने भिखारी    I  अब के नेता बनें शिकारी  II
तब के एक पंथ पर चलते  I  अब के नेता रंग बदलते   II

तब के त्यागी,तपसी, सीधे   I  अब के नेता व्होट खरीदे II
तब के नेता सब ठुकराये    I अब के शाही महल बनाये II

तब के को आराम-हराम    I अब के को सबसे प्रिय दाम II
तब के नेता को हम मानें   I अब के नेता को पहिचाने    II

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Wednesday, January 25, 2012

गणतंत्र पर्व


– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”
 
भारत के आज जन-जन  फूले नहीं समाते
भारत के आज कण-कण  फूले नहीं समाते
भारत का कोना-कोना  है  आज जगमगाया
गणतंत्र  पर्व  आया  ,  गणतंत्र  पर्व आया.

माँ हिंद के जलधि ने  पावन चरण पखारे
मंडरा  रहा  गगन में  घनश्याम रूप धारे
है आज चर-अचर में नव जागरण समाया
गणतंत्र  पर्व  आया , गणतंत्र  पर्व आया.

बरसा सुमन सलोने ,  तरुओं ने अर्चना की
ले स्वर्ण-थाल कर में, दिनकर ने वंदना की
‘जय-जय हो हिंद माँ की’ –कह चाँद मुस्कुराया
गणतंत्र  पर्व  आया  ,  गणतंत्र  पर्व आया.

मुख खोलकर सुहाना कलियाँ भी मुस्कुराई
रंगीन  पंख  ताने   तितली   ने  दी  बधाई
पीकर मधुर-मधुर रस  भौंरा यूँ गुनगुनाया
गणतंत्र  पर्व  आया ,  गणतंत्र  पर्व आया.

तरू डाल पर  सुशोभित  है पंछियों की टोली
स्वाधीनता अमर हो – बुलबुल चहक के बोली
मनहर  मयूर  नाचा  , कोयल ने गान गाया
गणतंत्र  पर्व  आया   ,   गणतंत्र  पर्व आया.

क्या शान  से  हमारा  फहरा  रहा  तिरंगा
उन्नत  सुनील  नभ  में  लहरा रहा तिरंगा
जय-जय  निनाद  गूँजा  सर्वत्र  हर्ष  छाया
गणतंत्र  पर्व  आया   ,  गणतंत्र  पर्व आया.

बस आज एक होकर  हम  सब यही मनायें
सारा  जगत  सुखी  हो ,  सर्वत्र शांति छाये
दु:ख-द्वव्द्व-द्वेष का हो अविलम्ब ही सफाया
गणतंत्र  पर्व  आया  ,   गणतंत्र  पर्व आया.

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Tuesday, January 17, 2012

गरीबी ! तू न यहाँ से जा.....


जनकवि स्व.कोदूराम “दलित”

गरीबी ! तू न यहाँ से जा
एक बात मेरी सुन ,पगली
बैठ यहाँ पर आ,
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

चली जायेगी तू यदि तो दीनों के दिन फिर जायेंगे
मजदूर-किसान सुखी बनकर गुलछर्रे खूब उड़ायेंगे
फिर कौन करेगा पूँजीपतियों ,की इतनी परवाह
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

बेमौत मरेंगे बेचारे ये सेठ,महाजन ,जमीनदार
धुल जायेगी यह चमक दमक,ठंडा होगा सब कारबार
रक्षक बनकर, भक्षक मत बन, तू इन पर जुलुम न ढा
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

सारे गरीब नंगे रहकर दु:ख पाते हों तो पाने दे
दाने-दाने के लिये तरस मर जाते हों,मर जाने दे
यदि मरे –जिये कोई तो इसमें तेरी गलती क्या
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

यदि सुबह शाम कुछ लोग व्यर्थ चिल्लाते हों ,चिल्लाने दे
“हो पूँजीवाद विनाश” आदि के नारे इन्हें लगाने दे
है अपना ही अब राज-काज –तू गीत खुशी के गा
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

यह अन्य देश नहीं, भारत है,समझाता हूँ मैं बार-बार
कर मौज यहीं रह करके तू, हिम्मत न हार, हिम्मत न हार
मैं नेक सलाह दे रहा हूँ, तू बिल्कुल मत घबरा
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

केवल धनिकों को छोड़ यहाँ पर सभी पुजारी तेरे हैं
तू भी तो  कहते आई है “ ये मेरे हैं, ये मेरे हैं “
सदियों से जिनको अपनाया है, उन्हें न अब ठुकरा
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

लाखों कुटियों के बीच खड़े आबाद रहें ये रंगमहल
आबाद रहें ये रंगरलियाँ , आबाद रहे यह चहल-पहल
तू जा के पूंजीपतियों पर, आफत नयी न ला
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

ये धनिक और निर्धन तेरे जाने से सम हो जायेंगे
तब तो परमेश्वर भी केवल समदर्शी ही कहलायेंगे
फिर कौन कहेगा “दीनबंधु”, उनको तू बतला
गरीबी तू न यहाँ से जा.....

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Wednesday, November 16, 2011

सिर्फ नाम ही रह जाना है


सहकारी सप्ताह पर आज भी प्रासंगिक
जनकवि स्व.कोदूराम “दलित” की कविता (छंद)

सहकारिता  से   बाँधा  बानर - भालू  ने सेतु
सहकारिता   का   यश  , राम  ने  बखाना  है
सहकारिता  से   ब्रजराज   ने  उठाया   गिरि
सहकारिता  का  यश  ,  श्याम ने  बखाना  है
सहकारिता से  लिया  गाँधी ने स्वराज्य आज
जिसके   सुयश  को   तमाम   ने   बखाना  है
उसी   सहकारिता  को  हमें  अपनाना है ‘औ’
अनहोना   काम   सिद्ध   करके  दिखाना   है.

तन – मन – धन  से यहाँ  का जन - जन अब
निरमाण  ही  के  पीछे  हो  गया  दीवाना है
बन   गये  ‘ भाखरा-भिलाई ’ से  नवीन तीर्थ
जिनसे   कि   मन - वांछित   फल  पाना   है.
चंद   बरसों   में  ही  चमक  उठा  देश   यह
मिला   इसे    जन – सहयोग   मनमाना   है
यहाँ  की   प्रगति   का   चमत्कार  देख , इसे
दुनियाँवालों ने  – ‘ एक  अचरज ’  माना  है.

पर  के   अधीन  रह     पिछड़ा  था  देश  यह
सहकारिता   से   इसे   आगे   को   बढ़ाना  है
‘ योजनाएँ ’  अपनी    सफल कर – कर   अब
उन्नति   के   श्रृंग   पर    इसको   चढ़ाना   है
अन्न – वस्त्र – घर  आदि  की समस्या हल कर
अविलम्ब  सारे   भेद - भाव  को  भगाना   है
क्रांति एक लाना है ‘औ’ गिरे को उठाना है ‘औ’
रोते  को  हँसाना है  ‘औ’  सोते को  जगाना है.

देने  का  समय  आया ,  देओ  दिल  खोल कर
बंधुओं  , बनो   उदार  ,  बदला   जमाना   है
देने   में   ही  भला है हमारा ‘औ’ तुम्हारा अब
नहीं - देना   याने    नयी - आफत   बुलाना है
देश   की   सुरक्षा   हेतु   स्वर्ण   देके आज  हमें
नये  -  नये   कई   अस्त्र  -  शस्त्र   मँगवाना  है
समय   को   परखो   ‘औ’  बनो भामाशाह अब
दाम   नहीं  ,   अरे  ,   सिर्फ नाम रह जाना है

Monday, November 14, 2011

वीर बालक



– जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”
 
उठ जाग हिंद के बाल वीर
तेरा भविष्य उज्जवल रे
मत हो अधीर, बन कर्मवीर
उठ जाग हिंद के बाल वीर.

रख भगतसिंह सा जिंदा दिल
तू देश विपद में बँटा हाथ
चल प्रिय चाचा नेहरू जी का
देशोन्नति में दे आज साथ.
तज दे आलस , कर श्रम कठोर
हर, दीन-हीन की कठिन पीर
उठ जाग हिंद के बाल वीर.

आजादी की रक्षा खातिर
मिट जाने को रह तैयार
कल को आने वाला है रे
तुझ पर स्वदेश का पूर्ण भार.
इसलिए अभी रे बालक
बन सच्चरित्र, बन समर धीर
उठ जाग हिंद के बाल वीर.

हिंदी काव्य संचय – जनकवि स्व.कोदूराम ”दलित”

 (सन 50 के दशक की रचना)