
जनकवि-स्व.कोदूराम ‘दलित’
बन्दौं छत्तीसगढ़ शुचिधामा | परम मनोहर सुखद ललामा ||
जहाँ सिहावादिक
गिरिमाला | महानदी
जहँ बहति विशाला ||
मनमोहन वन उपवन
अहई | शीतल -
मंद पवन तहँ बहई ||
जहँ तीरथ राजिम
अतिपावन | शवरी
नारायण मन भावन ||
अति उर्वरा भूमि जहँ
केरी | लौहादिक जहँ खान घनेरी ||
उपजत फल अरु विविध अनाजू | हरषित लखि अति मनुज समाजू ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ के ग्रामा | दायक अमित शांति –
विश्रामा ||
बसत लोग जहँ भोले-भाले | मन के उजले तन
के काले ||
धारण करते एक
लँगोटी | जो करीब आधा गज होती ||
मर मर कर दिन-रात कमाते | पर-हित में सर्वस्व लुटाते||
अति उदार अति सरल चित, सब मजदूर किसान |
उपजावत निज खेत में , विपुल कष्ट सहि धान ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ की खेती | भूखों को जो भोजन देती ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ की गैया | बन्दौं सरिता ताल तलैया ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ का
पानी | महिमा
जासुन जाइ बखानी ||
पान करत परदेशी भाई | मनवांछित सम्पदा कमाई ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ की बासी | सुर दुरलभ अति सरस सुधा-सी ||
जो नित इसका पसिया पीवै | निश्चय ही सौ वर्षों जीवै ||
बन्दौं लाल गोंदली चटनी | करत सकल रोगन की छँटनी ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ का खेंढ़ा | सुमधुर ज्यों मथुरा का पेड़ा ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ की रोटी | कनकी कोंढ़ा की अति मोटी ||
भाजी सँग जो नित
प्रति खावत | सो अति
बलशाली बन जावत ||
बन्दौं सबसे अधिक मैं, छत्तीसगढ़ की नार |
सीता –सावित्री सरिस , जिनके विमल विचार ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ की धूरी | बन्दौं सबकी बनी मँजूरी |
बन्दौं नून तेल अरु लकड़ी |जगत चुटैया है जो पकड़ी ||
बड़ों-बड़ों को नाच नचावै | इनका पार न कोऊ पावै ||
बन्दौं नेता जन-हितकारी | सच्चरित्र-सज्जन-सुविचारी ||
बन्दौं छत्तीसगढ़ की भाषा | अति मीठी ज्यों दूध-बताशा ||
श्रोता का मन हरने वाली| सबको वश में करने वाली ||
बन्दौं छत्तीसगढ़िया गायन | सुआ-ददरिया परम सुहावन ||
शुद्ध भावना से जो गावत | महा मोक्ष निज मन मह पावत ||
बन्दौं करमा छत्तीसगढ़िया | बन्दौं गौरा गायन बढ़िया ||
बाँस गीत बन्दौं सुख दानी | बन्दौं सुन्दर कथा कहानी ||
छत्तीसगढ़िया नाच को, बन्दौं बारम्बार |
जिसका पा सकता नहीं, कभी सिनेमा पार ||
पढ़त-सुनत अरु गुनत जो, छत्तीसगढ़ गुणगान |
पावत मन महँ सो अकथ, सुख अरु शांति महान ||
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बन्दौं दलित कवित्त मनोहर |
ReplyDeleteप्रिय लागे ज्यूँ गाये सोहर |
मंगल मंगल भली कामना |
छत्तीस गढ़ की प्रेम भावना |
सदा प्रांत यह बढ़ता जाए |
भारत को सद्मार्ग दिखाए |
सरल सौम्य हैं लोग यहाँ के |
नहीं व्यर्थ की गाथा हाँके |
बहुत बहुत आभार निगम जी |
पोस्ट पिता का पढ़ते हम जी ||
बहुत बढ़िया......
ReplyDeleteस्व. कोदू राम दलित जी को छत्तीसगढ़ का आदि कवि कहा जाता है। उनकी अप्रकाशित कृतियों को सामने लाने का यह प्रयास निश्चय ही स्तुत्य है।
ReplyDeleteछत्तीसगढ़ के बहुत सुंदर ढ़ंग से वर्णन करे हे।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया रचना।
निगम भैया ल कविता ल जन जन तक पहुचाय बर बहुत बहुत धन्यवाद।